Wasi | वसी | وسی

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15, Yemen Road, Yemen
| नक़्श फरियादी | उम्र गुज़ार दी गयी | गुलाब जामुन का रखवाला |

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उम्मत ए आदम अजीब दस्तूर में मुबतला है|
ऐ मिरी गुल-ज़मीं तुझे चाह थी इक किताब की 
अहल-ए-किताब ने मगर क्या तिरा हाल कर दिया ~ परवीन शाकिर
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तेज़ हवाई तूफ़ान 
बिलकुल उसकी ख़ुशबू की तरह है
जब वो मेरे पास होती है तो मेरे दिमाग़ में डर होता है, उसके चले जाने का डर|  मुझे हमेशा से तूफ़ान पसंद हैं |
वो किसी तबाही का इरादा नहीं करते 
फिर भी अपने जाने के बाद हर जगह अपना एहसास छोड़ जाते हैं| #instagood #instadaily #instagram #kasol #travel #hdr #nature #click #caption
ऐसी जगह जो ख़्वाब का एहसास दिलाए और जहाँ क़लम से स्याह लफ़्ज़ों के बजाए ख़ुश जज़्बात बहने लगें |
जहाँ की सर्द लहर जिस्म के अंदर तक आ जाए और सब  हसरतों को ठंडा करदे |
जहाँ आसमान देखने की फ़ुर्सत ना हो, जहाँ नज़ारे बिलकुल आँखों के सामने हों |
जहाँ जज़्बातों की आज़ादी हो, जहाँ सोचने से पहले कुछ भी सोचना ना पड़े|
ऐसी जगह मिले तो एक घर बनाना चाहता हूँ |
ऐसा घर जिसमें जान हो, इंसानियत की पहचान हो
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उजला ही उजला शहर होगा, जिसमें हम तुम बनाएँगे घर|
हम तुम रहेंगे कबूतर से, जिसमें होगा ना बाज़ों का डर |
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ज़िंदगी किस मोड़ पर आपके सामने एक नये रंग में आ जाए कोई नहीं जानता, एक गर्द ओ ग़ुबार के सफ़र के बाद रोशनी नज़र आयी, एक आम सी रोशनी पर अपने अंदर एक कहनी छुपाए हुए, इतने घेरे थे ज़िंदगी में पर उस रोशनी की ख़ूबसूरती ने सब घेरे साफ़ कर दिए |
मैं इस नयी रोशनी में वो गर्द की अंधेर भूल गया और आँखें बंद की |
आँखें बंद करते ही वो रोशनी और ज़िया हो गयी और मेरे चेहरे से धूल बज़ाहिर चमकने लगी |
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कुछ पसमंज़र ऐसे देखे, जहाँ दूर तक फैली धूप और छांव के टुकड़े अपने से आगे वाले टुकड़ों की जगह लेने को बेताब थे |
वो हर बार आगे बढ़ जाते और आगे वाले कुछ और आगे बढ़ जाते, उनके चेहरे पर जीत की सुर्ख़ी थी और दिल में आगे बढ़ते रहने की ख़ुशी |
पर तस्वीर का दूसरा रुख़ उनको नहीं मालूम था, हद ए फ़ानी की तरफ़ बढ़ते जाना उनको आख़िरश महँगा पड़ा |

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पर्दा डालने में हमारा जवाब नहीं, कुछ भी छुपाना हो|
किसी की बद्कारी हो या अपनी मक्कारी |
हमपर दो ही काम तो आते हैं|
पर्दा डालना और हवा निकालनी |
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किताबें बातें करती हैं मुझसे अकेले में और कहती हैं, मुकम्मल समाज हमारे अंदर है |
इतिहास के ख़ाली पन्नों पर ख़ून की सियाही हमारी रगों में दौड़ती है |
नमरूद के शैतानी इरादों से इब्राहीम के ख़लील अल्लाह हो जाने की दास्तान | 
टेगौर के इंक़लाबी हो जाने की दास्तान, सियालकोट में इक़बालियत की दास्तान |
मैं समझ नहीं पाता हूँ, कॉफ़ी के आख़री सिप तक सिर्फ़ किसी लालची इंसान की तरह अपने चारों तरफ़ इस किताबी हलक़े का गश्त लगाता हूँ और बस सोचने की कोशिश करता हूँ कि ये किताबें मुझसे क्या कहना चाहती हैं ?
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पेड़ से ज़मीन तक का सफ़र करना सबसे मुश्किल होता है, अपने उरूज से ग़ुलूब तक का सफ़र।
वो पेड़ से गिरता हुआ पत्ता अपना आख़री सफ़र कर रहा था, ज़मीन पर बाक़ी पड़े हुए पत्तों से मिलने का सफ़र |

जो उससे पहले इस पतझड़ की मार झेल चुके हैं |
एक स्थिरता के साथ वो पत्ता नीचे गिर रहा था, पर वो उदास नहीं था बल्कि वो ख़ुश था |

क्योंकि वो पत्ता अभी गिरा नहीं था, अभी उसने ख़ुद अपने रंग में उड़ना सीखा था, आज पहली बार वो किसी दरख़्त का हिस्सा नहीं था |
वो आज़ाद था वो अपने वजूद को महसूस कर सकता था |
गिरना और बाक़ी सब पत्तों में मिल कर अपनी पहचान  खो जाना शायद उसका मुस्तक़बिल हो, पर इस वक़्त सिर्फ़ तेज़ हवा है, जो उसे अपने साथ कहीं दूर ले जाना चाहती है,
पर उस पत्ते को उस वक़्त कुछ नहीं सूझ रहा था |
बस उसके ज़ेहन में है, तो वो ये कि वो अपने लिए एक बेहतर माज़ी बना सकता है, वो गिरने से पहले तक उड़ सकता है |
और इसी उड़ान के दौरान शायद वो समझ पाए, उसकी ज़िंदगी ज़मीन और आसमान के दरमियान कहीं है |
वो दौर जिसमें दिल का नहीं है कोई मकाम, पत्थर से कर रहा है जो शीशे का एहतिराम,
इस दौर में बजुर्रते रिंदाना दिल की बात, कहता रहा था कोई तो मंटो था उसका नाम |

मंटो कि जिसने ज़हर पिया है बहरनफस और ज़िंदगी का नाम लिया है तमाम उम्र, तहज़ीब का खुरच के हर एक गाज़-ए-फरेब, इंसां का इंतकाम लिया है तमाम उम्र
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धूप साये की तरह फैल गयी,
इन दरख़्तों की दुआ लेने से |
~ काशिफ़ हुसैन